स्वामि कार्तिकेय का चरित्र वर्णन

             ब्रह्माजी कहते हैं- अब विष्णुजी आदि सब देवता परमोत्सव कर कुमार को कैलास चलने की प्रेरणा देने लगे। कुमार ने पर्वतराज हिमालय को आशीवर्चन दे कैलास की यात्रा की, देवता मांगलिक जय शब्द करने लगे। कुमार एक परम दिव्य विमान पर बैठ, अपने साथ देवताओं को बैठाकर शिवजी की जय बोलते हुए उनके पास आये। आनन्द ध्वनि करते हुए सब शिवजी के पर्वत पर पहुंचे। विष्णु आदि ने शिवजी को प्रणाम कर उनकी स्तुति की। कुमार ने भी बड़ी नम्रता से विमान से उतर सिंहासन पर बैठे शिव-पार्वती को प्रणाम किया। शिवजी ने आनन्द में आकर पुत्र का मुख चुम्बन किया। तारक शत्रु महाप्रभु कुमार पर बड़ा स्नेह किया। पार्वतीजी ने भी कुमार को उठाकर गोद में बिठा लिया और सिर पर हाथ रखकर चुम्बन किया। शिव-पार्वती का उन पर बड़ा प्रेम हुआ। शिव मन्दिर में बड़ा उत्सव मनाया गया। नमस्कार और जय का बहुत शब्द हुआ। विष्णु आदि देवताओं ने स्कन्दजी को आगे कर शिवजी की स्तुति की। सर्वेश्वर स्वराट् प्रसन्न हो हंसने लगे। फिर विष्णु आदि देवताओं से बोले – मैं देवताओं के लिए कृपा का कोष हूं। मैं दुष्टों को मारने वाला, त्रिलोकी का अधिपति भक्तवत्सल शंकर हूं। मैं सबका कर्त्ता, भर्त्ता, हर्त्ता, और विकार रहित हूं। तुम पर जब दुःख पड़े मुझे स्मरण करो, मैं तुम्हें सुखी करूंगा।

             यह सुन कुमार सहित सब देवता हर्षित हो अपने स्थान को चले गये। कुमार अपने माता-पिता शिव-पार्वती के पास उसी पर्वत पर निवास करने लगे हे नारद यह मैंने तुमसे कुमार के सब चरित्र कहे। अब आगे क्या सुनना चाहते हो वह कहो।

             इति श्रीशिवमहापुराण चतुर्थ कुमार खण्ड का बारहवां अध्याय समाप्त। क्रमशः

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