गतांक से आगे छब्बीसवां अध्याय कथा-प्रसंग
शिव और दक्ष का विरोध
ब्रह्माजी बोले – इस प्रकार पूर्वकाल में प्रयाग में एकत्र होकर मुनियों ने एक महायज्ञ किया, जिसमें सपरिवार मैं भी सम्मिलित हुआ। अनेक शास्त्रों में ज्ञान काण्ड पर विचार हुआ। अपने गणों को साथ लिये शिवजी भी सती सहित उसमें आये। सबने भक्तिपूर्वक उन्हें प्रणाम कर उनकी स्तुति की। सब शिवजी के दर्शन से सन्तुष्ट हो अपने भाग्य की प्रशंसा करने लगे। इसी समय प्रजापतियों के स्वामी दक्षजी भी वहां आ पहुंचे और उन्होंने केवल मुझे ही प्रणाम किया तथा मेरी आज्ञा से वहां बैठ गये। फिर सबने तेजस्वी दक्ष की बड़ी पूजा की। परन्तु परम स्वतन्त्र लीलाविहारी महेश्वर अपने आसन पर ही बैठे रहे और उन्होंने दक्ष को प्रणाम भी नहीं किया। इससे दक्ष को बड़ा क्रोध आया। उन्होंने सभा के मध्य में सबको सुनाते हुए शिवजी को बहुत कुवाच्य कहा और कहा कि यह पाखण्डी, दुर्जन, पापशील, ब्राह्मण-निन्दक, सर्वदा स्त्री में आसक्त और रति में प्रवीण है। सम्बन्ध से मेरा पुत्र होते हुए भी इसने मुझे प्रणाम तक नहीं किया, अतः मैं इसे शाप दूंगा। हे ब्राह्मणों और देवताओ, तुम सभी सुन लो। यह शिव मेरे द्वारा सर्वथा ही वध करने योग्य है। मैं इसे बहिष्कृत करता हूं। अब आज से यह देवताओं के साथ भाग नहीं पायेगा। यह वर्णविहीन श्मशानवासी और कुल जन्म से हीन है।
यह सुनते ही नन्दीश्वर की आंखें लाल हो गयीं। उसने दक्ष को बहुत डांटा और फटकारा। दक्ष नन्दीश्वर को भी शाप देने लगे। शिवजी के समस्त गणों को भी उन्होंने शापित किया। फिर तो नन्दीश्वर को और भी क्रोध आ गया। उसने उस महागर्वित दक्ष से कहा- हे दुष्टबुद्धे, क्या तुम शिव-तत्त्व को नहीं जानते? रे मूर्ख, यह जो तुमने भृगु आदि ऋषियों के मध्य में इन महाप्रभु भगवान शंकर का उपहास किया है इससे शिवजी के प्रभाव से मैं भी तुम्हें शाप देता हूं कि तुम सब ब्राह्मण वेद का वास्तविक अर्थ न समझ करके केवल अर्थवाद पर ही विश्वास करोगे। जब क्रुध नन्दीश्वर ने इस प्रकार ब्राह्मणों को शाप दे दिया, तब वहां बड़ा हाहाकार मच गया और दक्ष ने तो पहले ही शंकरजी को शाप दे दिया था। तब भगवान शंकर नन्दीश्वर को समझाते हुए बोले – हे महाप्राज्ञ, तुम्हें क्रोध नहीं करना चाहिये था। तुमने मेरे नाते व्यर्थ ही बाह्मण वंश को शाप दे दिया। मैं ब्राह्मण और वेद को शाप नहीं देता। तुम यह यथार्थ में जान लो कि दक्ष का शाप मुझे नहीं लगा। अब तुम शान्त हो जाओ। मैं ही यज्ञ, यज्ञकर्म और यज्ञों का अंग हूं। सब मुझमें ही विद्यमान हैं अब शान्त हो, क्रोधादि त्याग स्वस्थ हो जाओ। नन्दीश्वर शान्त हुए। शिवजी अपने सब गणों को साथ ले निजधाम को चले गये। दक्ष भी ब्राह्मणां को साथ ले अपने स्थान को चला गया। अब प्रजापति दक्ष शिव-निन्दक हो गया। हे तात नारद, यह मैंने शिव और दाक्ष का विरोध कहा। अब जैसे दक्ष को शिवजी के द्वारा दण्ड मिला उसे आगे कहूंगा, ध्यान पूर्वक सुनो।
इति श्रीशिवमहापुराण द्वितीय सती खण्ड का छब्बीसवां अध्याय समाप्त। क्रमशः