गतांक से आगे, चतुर्थ कुमार खण्ड प्रारम्भ, चौदहवां अध्याय, कथा-प्रसंग
शिवजी के गणों से पार्वती-गण गणेशजी का विवाद
गतांक से आगे…यह सुनकर निर्भीक पार्वती पुत्र ने उन्हें घुड़क दिया और द्वार से न हटे। इस पर शिवजी के गण लौट गये और जाकर सब बातें कह सुनाईं। उसे सुन शिवजी अपने गणों को नपुंसक कहकर डांटने लगे और कहा कि, मैं कुछ नहीं जानता, जैसे भी हो, जाकर उस गण को हटाओ। वे गण फिर वहीं लौट कर द्वारपाल से पूछने लगे कि, वास्तव में तुम कौन हो और यहां पर क्यों स्थित हो तथा तुम्हें किसने यहां पर स्थापित किया है? क्यों मरना चाहते हो? भाग जाओ, नहीं तो अभी तेरे प्राण ले लूंगा। यह सुन गणेशजी कुपित हो अपने हाथों में लाठी पकड़ कर उन कहने वाले गणों को डॉंटने, मारने लगे और यह कहने लगे कि, जाओ, जाओ, दूर जाओ, नहीं तो मैं अभी तुम्हें अपना उग्र पराक्रम दिखाता हूं।
यह सुन शिव गणों को बड़ी चिन्ता हुई कि, क्या करें और कहां जाएं। मर्यादा का अतिक्रमण हो रहा है। ऐसा विचार कर वे गण शिवजी के पास फिर गये और एक कोस की दूरी से ही चिल्लाकर उक्त बातें कहने लगे। इस पर हाथ में त्रिशूल लिये हुए उग्र बुद्धि वाले शिवजी ने अपने गणों से कहा- हे गणो! तुम सब नपुंसक हो। जाओ और मारो। कोई भी हो, अधिक कहने से क्या है? उसको शीघ्र ही वहां से हटाओ और अब वे गण फिर पार्वती मन्दिर पर उस द्वारपाल गणेश के पास आये। जब हटने को कहा तो गणेशजी ने कहा, मैं पार्वती पुत्र हूं, कदापि नहीं हट सकता। इतने में द्वार पर हो-हल्ला होता सुन कर पार्वतीजी ने अपनी एक सखी को भेजा कि देख वहां क्या हो रहा है। सखी ने देखकर हर्षित हो सब वृत्तान्त पार्वती जी से कहा। साथ ही यह भी कहा कि, अच्छा हुआ जो नहीं आने दिया, अन्यथा शिवजी तो सर्वदा बिना कहे सुने ही अन्दर घुस आया करते हैं। हे देवि, तुमको अपना मान नहीं छोड़ना चाहिए।
पार्वती जी ने कहा-ठीक है। परन्तु यह तो देखो कि क्षण भर के लिये मेरा पुत्र द्वार पर स्थित न हुआ था कि उनके गण आकर बलात्कार करने लगे। फिर मैं विनय और नम्रता को क्यों अपनाऊं? जो होगा देखा जायेगा। यह विचार कर पार्वतीजी ने फिर एक सखी को द्वार पर भेजा। उसने आकर गणेश जी से कहा कि, हे भ्रद, तुमने ठीक किया जो उन्हें बल से घुसने नहीं दिया। तुमको ये सब गण जीत नहीं सकते। इसमें शत्रुता की भी कोई बात नहीं है। तब सखी द्वारा माता के सन्देश पाकर गणेश जी बड़े प्रसन्न हुए और उन्हें बड़ा बल प्राप्त हुआ। अब वे अपनी कच्छ, पकड़ी और जांघिया को कस-बांध कर निर्भय हो उन गणों से बोले मैं तो पार्वती का पुत्र हूं और तुम सब शिव के गण हो। समता प्राप्त देनों अपना कर्तव्य पालन करें। क्या एक तुम्हीं द्वारपाल हो, मैं नहीं। यदि तुम सब यहां स्थित हो तो मैं भी यहां ही स्थित रहूंगा। इस समय मैं पार्वतीजी की आज्ञा से स्थित हो उनकी आज्ञा का पालन करूंगा। तुम भी शिव की आज्ञा का पालन करो।
यह सुन शिवजी के गण हठपूर्वक फिर मन्दिर में नहीं गये और शिवजी के पास लौट कर सब वृत्तान्त निवेदन किये। यह सुन शिवजी लौकिकी गति का आश्रय ले अपने गणों से बोले- अच्छा तो अब युद्ध न करो। क्योंकि तुम सब हमारे गण हो वह पार्वती का गण है। परन्तु विनय करने से भी लोक में हमारी अप्रतिष्ठा होगी और सब यही कहेंगे कि शिवजी स्त्री के वश में हैं। इस कारण अब नीतियुक्त कार्य करो। वह अकेला गण तुम सबके आगे क्या पराक्रम दिखायेगा? फिर पति के आगे स्त्री क्या हठ करती है। यदि पार्वती हठ करेगी तो अवश्य ही हठ का फल पायेगी। निदान मेरी आज्ञा से तुम लोग युद्ध ही करो। जो होगा देखा जायेगा। ऐसा कह कर लौकिकी लीला करने वाले शिवजी चुप हो गये।
इति श्रीशिवमहापुराण चतुर्थ कुमार खण्ड का चौदहवां अध्याय समाप्त। क्रमशः