गतांक से आगे, चतुर्थ कुमार खण्ड प्रारम्भ, तेरहवां अध्याय, कथा-प्रसंग
गणेश उत्पत्ति और चरित्र
सूतजी कहते हैं- तारकासुर के शत्रु स्कन्द का यह चरित्र सुन कर नारदजी बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने ब्रह्माजी से कहा कि, हे प्रजानाथ, स्वामि कार्तिकेय का यह अमृतमय चरित्र तो मैंने सुना, अब कृपा कर सब मंगलों के भी मंगल श्रीगणेश जी का दिव्य चरित्र मुझे सुनाइये।
तब नारदजी के इस प्रकार के वचनों को सुनकर ब्रह्माजी प्रसन्न हो शिवजी का स्मरण करते हुए बोले- हे नारदजी, कल्पभेद से गणेशजी के कई प्रकार के चरित्र हैं। उनमें से एक बार शनि की दृष्टि से उनका सिर छेदन हुआ और हाथी का सिर जुड़ा, श्वेतकल्प में होने वाले गणेशजी की उत्पत्ति कहता हूं। जिसमें कृपालु शंकरजी ने ही उनका शिरोच्छेदन किया था। सृष्टिकर्त्ता शंकर के विषय में यह सब कुछ भी सन्देह करना योग्य नहीं है। क्योंकि सबके पति शंकरजी सगुण भी हैं और निर्गुण भी। वह लीला से ही सब जगत् की उत्पत्ति, पालन और संहार करते हैं।
हे मुने, अब आदर सहित उनके चरित्र को सुनो। जब विवाह कर शिवजी कैलास पर चले गये, तब कुछ समय व्यतीत होने पर गणपति का जन्म हुआ।
एक समय की बात है। जया और विजया नामक पार्वतीजी की दो सखियों ने परस्पर विचार कर पार्वती से जाकर कहा कि शंकरजी के द्वार पर जो हमारे असंख्य गण एवं द्वारपाल विराजमान रहते हैं, उन पर हमारा अधिकार होते हुए भी कुछ भी अधिकार नहीं है। क्योंकि हमारा मन उनसे नहीं मिलता। अतएव हे भगवती, हे पुण्यशीले, एक हमारा भी कोई गण होना चाहिए। आप उसकी रचना करिये। देवी पार्वती को सखियों की यह बात प्रिय लगी और उन्होंने उसकी रचना की इच्छा की।
जब एक समय पार्वतीजी स्नान कर रही थीं और नन्दी द्वार पर बैठा हुआ था तब उसके मना करने पर भी शिवजी हठात् मन्दिर में प्रवेश कर गये, जिससे लज्जित हो जगदम्बिका तुरन्त उठ बैठीं। तब उन्हें अपनी सखी का वचन याद आया और परमेश्वरी ने अपने कोई एक अत्यन्त श्रेष्ठ सेवक की आवश्यकता प्रतीत हुई। उन्हांने सोचा, मेरा एक ऐसा सेवक हो जो मेरी आज्ञासे कदापि विचलित न हो। ऐसा विचार करके पार्वतीजी ने अपने शरीर के मैल से सर्वलक्षण सम्पन्न एक पुरुष का निर्माण किया। वह शरीर के सब अवयवों से निर्दोष तो था ही किन्तु सुन्दर, विशाल और सर्व शोभा सम्पन्न तथा महाबली एवं पराक्रमी था। पार्वती ने उसे अनेक प्रकार के वस्त्रों से सजा अनेक प्रकार के अलंकारों से युक्त कर बड़ा आशीर्वाद दिया और कहा कि तुम्हीं एकमात्र मेरे पुत्र हो, दूसरा कोई नहीं है। तब उस पुत्र ने पार्वती जी से कहा कि, हे माता, मेरे लिए क्या आज्ञा है। मैं आपकी सब आज्ञाओं को पूर्ण करूंगा। पार्वती जी ने कहा कि तुम मेरे द्वार के रक्षक रहो। मेरी आज्ञा के बिना कोई कैसा भी क्यों न हो, मेरे घर के भीतर न आने पावे। कितना भी कोई हठ क्यों न करे, तुम उसे न आने देना।
ऐसा कह कर पार्वतीजी ने गणेशजी के हाथों में एक लकड़ी दे दी और प्रेम से मुख चूम कर द्वार पर बिठा दिया। वह लकड़ी ले गणेशजी माता के हितार्थ द्वारा पर जा बैठे। तब पार्वती जी फिर जाकर स्नान करने लगीं। उसी समय शिवजी फिर द्वार पर आ गये और जब अन्दर जाने लगे तब शिवजी को न जान कर गणेश्वर ने कहा कि मेरी माता की आज्ञा के बिना आप नहीं जा सकते। माता इस समय स्नान कर रही हैं। तुम कहां जाते हो? यहां से चले जाओ। यह कह कर गणेशजी ने लकड़ी ले उन्हें रोक दिया। शिवजी ने कहा, मूर्ख, तू किसको रोकता है? क्या मुझे नहीं जानता कि मैं शिव हूं।
यह सुनते ही गणेश ने महेश्वर पर लकड़ी से प्रहार कर दिया। इस प्रकार महेश्वर ने क्रुध होकर कहा- हे बालक, तू मूर्ख है। क्या नहीं जानता कि मैं गिरिजापति शंकर हूं? रे बालक, मैं अपने ही घर में जाता हूं। तू मुझे क्यों रोकता है। ऐसा कह जब गणेश जी की परवाह न कर शिवजी पुनः भीतर जाने लगे तो गणेशजी ने फिर उन पर लकड़ी का प्रहार कर दिया। इस पर शिवजी ने क्रुद्ध हो अपने गणों को आज्ञा दे दी कि इसको रोको। ऐसा कह शिवजी बाहर ही स्थित रहे। अद्भुत लीलाधारी संसार को अपनी लीला दिखाने लगे।
इति श्रीशिवमहापुराण चतुर्थ कुमार खण्ड का तेरहवां अध्याय समाप्त। क्रमशः