कुमार की प्रबल विजय

             ब्रह्माजी बोले- हे नारद, इसी समय बाणासुर नामक दैत्य से पीड़ित क्रौंच नामक पर्वत ने कुमार के पास आकर उनकी स्तुति की और कहा कि, हे प्रभो, मुझे बाणासुर बड़ा कष्ट दे रहा है। आप मेरी रक्षा कीजिये। तब क्राैंच की स्तुति से प्रसन्न हो स्कन्दजी ने उसे सांत्वना दी और शिवजी का ध्यान कर वहीं से बैठे-बैठे बाण के लिए जो एक शक्ति छोड़ी तो वह उसे भस्म कर शीघ्र ही कुमार के पास लौट आयी। कुमार ने क्रौंच से कहा कि अब तुम निर्भय हो अपने घर जाओ, वह दैत्य नष्ट हो गया। राजा क्रौंच कुमार का यह वचन सुन उनकी स्तुति कर अपने घर लौट गया।

             वहां जाकर उसने शंकरजी के प्रसन्नतार्थ उनके तीन लिंगों की स्थापना की। प्रतिज्ञेश्वर, कपालेश्वर और कुमारेश्वर। ये तीनों लिंग सिद्धिदायक हैं। फिर देवगुरु वृहस्पति को आगे कर सब देवताओं ने कैलास में जाने की इच्छा की तो वहां प्रलम्बासुर नामक दैत्य उपद्रव करने लगा। उससे पीड़ित शेषजी का पुत्र कुमुद कुमार की शरण आया। गिरिजा पुत्र की स्तुति की। कुमार ने प्रसन्न हो शक्ति चला प्रलम्ब का संहार कर दिया। वह असुर अपने अनुचरों सहित मारा गया। शेष पुत्र कुमुद, शिव पुत्र कुमार की स्तुति कर अपने घर पाताल आया और कुमार का सबसे अद्भुत चरित्र कहा। जो मनुष्य कुमार के इस चरित्र को पढ़ता और सुनता है उसे शिवलोक की प्राप्ति होती है तथा वह यहां परम सुख भोग कर अन्त में दिव्य मोक्ष को भी प्राप्त करता है।

             इति श्रीशिवमहापुराण चतुर्थ कुमार खण्ड का ग्यारहवां अध्याय समाप्त।  क्रमशः

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